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Tuesday, 17 October 2017

जनवरी में वैष्णो देवी यात्रा...... भाग-4


"अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥"


लंका पर विजय हासिल करने के बाद मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मन से कहा," हे लक्ष्मण! यह सोने की लंका मुझे किसी तरह से प्रभावित नहीं कर रही है माँ और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़ कर है।"

भारत की इस पावन भूमि को शत-शत नमन करते हुए आज के अपने इस तीसरे लेख को मैं आप सब को समर्पित कर रहा हूं। भारत एक ऐसा देश है कि आप अगर सात जन्म भी ले लें तो भी इस देश में स्थित तीर्थ स्थानों, प्राकृतिक दृश्यों से सराबोर पर्यटक स्थलों और अन्य स्थानों का भ्रमण नहीं कर सकते। एक ऐसा विशाल भूभाग है भारत जिसके कण-कण में देवी देवताओं का निवास है। प्रकृति ने इस पुण्यभूमि को अपने दोनों हाथों से आशीर्वाद देकर इसे अनुपम सौंदर्य से नवाज़ रखा है। मेरा, आपका, हम सबका सौभाग्य है कि हम सब भारत मे रहते हैं।

                                  कटरा से शिव खोड़ी गुफा तक

                       खैर, मैं अपने यात्रा वृतांत पर आता हूं। जब मैं सुबह सो कर उठा तो सबसे पहले देवांशु को उठाया। शिवखोड़ी जाने या न जाने पर बहस भी हुई, पर अंत में यह निर्णय हो ही गया कि शिवखोड़ी जाना है। अब बारी आई नहाने की। कटरा कोई बहुत अधिक ऊंचाई पर नही है। समुद्र तल से 876 मीटर पर कटरा स्थित है। जनवरी में हमारे मैदानों में ही बहुत ठंड पड़ती है, तो कटरा में अधिक ठंड होनी तो स्वभाविक ही थी। जनवरी में सुबह 7 बजे ठंडे पानी मे नहाना(वो भी पहाड़ो से आता है ठंडा पानी)। मित्रवर ने तो हाथ खड़े कर दिए। पर मैं तो दैनिक क्रियाओं से फारिग होकर बाथरूम में घुसा ओर नहाना शुरू किया। शुरू में तो पानी ने जरूर कंपकपी पैदा की शरीर मे, पर 5-6 डिब्बे डालने के शरीर अभ्यस्त हो गया।

                             कपड़े आदि बदल कर हम "वीर-भवन" के संचालक श्रीमान संगीत सिंह जी के पास पहुंचे और उनसे शिवखोड़ी जाने के बारे में बात की। उनके जानकार होंगे कोई(नाम मुझे ध्यान नही) तो उन्होंने कहा कि आप ऐसा करना, बस-स्टैंड पर उनके पास चले जाना। मैं उन्हें फोन कर देता हूं कि आप 2 लोग आ रहे हैं। संगीत जी के वह मित्र कटरा से शिवखोड़ी तक टूरिस्ट बस चलाते हैं। संगीत जी के कहे अनुसार हम उनके मित्र के पास जाने के लिए चल पड़े। कल की ही तरह हमने अपना सामान लॉकर में ही जमा करवा दिया था। सिर्फ रात की ठंड से बचने के लिए मैंने गरम स्वेटर रख ली और वीर-भवन से बाहर आ गए। एक किलोमीटर पैदल चलकर हम कटरा के बस स्टैंड पहुंचे और पूछताछ करके संगीत जी के मित्र के पास पहुंच गए। उनसे राम-राम हुई, बात की उन्होंने बोला कि मेरे पास फोन आ गया था, आपकी सीट बुक कर दी गयी है। उन्होंने हमें टिकट लेने के लिए कहा। हमने जब टिकट के पैसे पूछे तो उन्होंने ₹360 दोनों जनों के बताएं। अब जैसा कि हम भारतीयों का स्वभाव और रीति दोनों ही है, हमने उन्हें वही जवाब दिया कि भैया ठीक-ठीक लगा लो। आगे से उनका जवाब था कि आप R.S.S. से हो तो हमने पहले ही 100 रुपए कम कर दिए हैं, वरना बाकी सब से ₹220 प्रति सवारी लेते हैं। अब कहने सुनने की कोई गुंजाइश नहीं थी।  हमने टिकट ली और आग्रह करके उनसे खिड़की के पास वाली डबल सीट की माँग की। उन्होंने हमें एक विंडो सीट दे दी जोकि बस की सबसे आखिरी सीट थी। उस बस में केवल मात्र दो ही सीटें बची हुई थी जोकि संगीत जी ने हमारे लिए पहले ही बुक करवा दी थी। हमने बस चल संचालक का धन्यवाद किया और जाकर अपनी सीट पकड़ ली। लगभग आधे घंटे के इंतजार के बाद बस ने बस स्टैंड को छोड़ दिया और शिवखोड़ी की और जाते हुए रास्ते को पकड़ लिया। लगभग 15 मिनट के बाद टिकट की चेकिंग करने वाला एक लड़का आया और हम से टिकट की डिमांड करने लगा। अब हम सबसे आखरी यात्री थे तो हमारी टिकट चेक करने के बाद उसके पास कोई काम नहीं था। मैंने उसे अपने पास बैठने का आग्रह किया जिसे उसने सहर्ष मान भी लिया। वह हमारे पास बैठा और मैंने उससे बातचीत शुरू कर दी। सबसे पहले मैंने उसे पूछा कि शिवखोड़ी में देखने लायक क्या है, रास्ते में कहाँ-कहाँ बस रुकती हैं आदि। उसने हमें रास्ते की सारी जानकारी दी। मैं भी आपको सब बताऊंगा, बस आप पढ़ते रहिये।
जय महामाई वैष्णो। 5 बार तो बुला लिया आपने, छठी बार भी बुलाओगी तो इससे भी ज्यादा उत्साह से आऊंगा।

वीर-भवन से बाहर निकल कर लिया एक चित्र। पीछे भवन की ओर जाता रास्ता दिख रहा है।


लगभग 20 मिनट चलने के बाद ड्राइवर ने बस के ब्रेक लगा दिए। खिड़की से बाहर देखा तो पास में एक मंदिर था। हमने पहले ही पूछ लिया था तो अब दोबारा किसी से पूछने की आवश्यकता नहीं थी। आप सब को तो बता ही देता हूं कि बस रुकी थी जीतू बाबा के मंदिर के सामने। कटरा से शिवखोड़ी जाते हुए रास्ते में यह पहला स्थान है, जहां बस रुकती है। मंदिर का निर्माण कार्य उस समय चल रहा था। हमने अपने जूते बस में ही उतार दिए थे तो रास्ते में बजरी पर चलते हुए हमें बहुत दिक्कत आई, पर जैसे तैसे करके हम मंदिर में पहुंच गए और दर्शन किए।

इस मंदिर के बारे में लोगों की मान्यता है की जित्तो बाबा जी को वैष्णो माता का आशीर्वाद प्राप्त था। जीतो बाबा हर रोज अपने घर से मां वैष्णो देवी के दर्शन करने के लिए गुफा तक जाया करते थे। आप मे से जो लोग वैष्णो देवी गए होंगे, उन्हें पतां होगा कि जब हम कटरा से  त्रिकुटा पर्वत पर देखते हैं तो हमे माँ वैष्णो का भवन नही दिखता। ऐसा इसलिये है क्योंकि भवन पर्वत के दूसरी तरफ है। जित्तो बाबा के मंदिर से भवन साफ-साफ दिख जाता है। जित्तो मन्दिर के प्रांगण में जित्तो बाबा की एक प्रतीकात्मक मूर्ति भी है, जिसमे वे मां वैष्णो देवी दरबार की तरफ देख रहे हैं। जित्तो बाबा मंदिर परिसर में एक पानी का कुंड भी है। मान्यता है कि इसमें स्नान करने से स्त्रियों को संतान प्राप्ति होती है। हमने भी दर्शन किए और बस में आकर बैठ गए। 
माता के भवन की ओर देखते हुए बाबा जित्तो।


बाबा जित्तो ओर उनकी पुत्री बुआ कोड़ी। कोड़ी बुआ को माता वैष्णो का अवतार माना जाता हैं।
(उपरोक्त दोनो चित्र मेरे द्वारा नही लिए गए हैं)



                         कुछ देर बाद बस ने प्रस्थान किया। 10 मिनट भी नहीं चले होंगे कि फिर से ड्राइवर साहब ने ब्रेक लगा दिए।  अब रुकने की बारी थी नौ देवी मंदिर में। नौ देवी मंदिर के बारे में आपको बता देता हूं कि 9 देवी मंदिर कटरा-शिवखोरी यात्रा मार्ग पर स्थित है। शिवखोड़ी जाने वाले लगभग सभी यात्री इस मंदिर के दर्शन करते हैं। जब हम ने मंदिर में प्रवेश किया, तो कुछ सीढियां उतरने के बाद हमारा सामना लम्बी लाइन से हुआ। जो मुख्य गर्भगृह है, वह बहुत नीचे उतर कर है। इस मंदिर में माता पिंडी रूप में अवस्थित है, लेकिन इसमें छोटे-छोटे आकार की पिंडियाँ हैं, जिनके लिए गुफा में रेंगते हुए जाना पड़ता है। गुफा कोई 20 फीट के आस-पास होगी पर यह गुफा ना तो ज्यादा संकरी हैं और ना ही बहुत खुली। हमने भी लाइन में लगकर आधा घंटा इंतजार किया और पहुंच गए गुफा के दरवाजे पर। लोग धीरे-धीरे गुफा के अंदर प्रवेश कर रहे थे तो दिवांशु और मैंने भी झुक कर अपने चारों पैरों( 2 हाथ और 2 पैर) पर चलकर गुफा में प्रवेश किया और अंदर जाकर माता के दर्शन किए।

                यह मंदिर एक नदी के किनारे स्थित है। यह स्थान बहुत रमणीक प्रतीत होता है। मंदिर से बाहर आकर हमने आसपास के नजारों के साथ अपने चित्र लिए। जिस समय हम चित्र ले रहे थे, तो दोनों का इकट्ठा फोटो लेने के लिए हमने एक यात्री को बोला। हमारे फोटो खींचने के बाद उसने हमें उसका फ़ोटो लेने के लिये बोला। बस ऐसे ही जान पहचान हो गई। वह चार लोग थे जो हैदराबाद से आए थे। बातचीत हुई तो उन्होंने मुझे हैदराबाद आने का न्योता दिया और नम्बरो का आदान-प्रदान भी हुआ। इसके बाद हम सभी इकठे होकर बस में आकर बैठ गए। थोड़ा इंतज़ार के बाद बस भी अपने गंतव्य की ओर रवाना होने लगी।


9 देवी मंदिर के बाहर नदी किनारे का दृश्य।

देवांशु ओर मैं।


हम दोनों के ये चित्र उन हैदराबाद वाले ग्रुप में से किसी एक ने लिये हैं।
हैदराबाद वालो के साथ एक selfie।


बस के रवाना होने के बाद हम सब आपस मे बातें करने लगे। पहाड़ी रास्तों पर बस नागिन की तरह बल खाती हुई चक रही थी। बहुत से लोगो को यह समस्या होती है कि वे अपना खाया-पिया सारा बस में निकाल देते हैं। हम सबसे आखिरी सीट पर बैठे थे और window seat पर मैं  बैठा था, तो मैंने तो अपनी खिड़की बन्द कर रखी थी। क्या पता कब किसी को feeling आ जाए और भुगतना मुझे पड़े। लगभग 1 घण्टे बाद बस एक ढाबे पर आकर रुकी। इस ढाबे से शिवखोड़ी की दूरी 35 किलोमीटर रह जाती है। यहाँ बस में आधा घण्टा रुकना था, तो हमने भी उतरकर चाय और ब्रेड का नाश्ता किया, ओर शुरू हो गया photo session।
जय हिमालय।


मेरे पसंदीदा चित्रो में से एक।

पर्वतों की गोद मे 2 भाई।



आज मेरा पूरा मन था कि इस यात्रा को पूर्णविराम दे दूं। पर माफी चाहूंगा मित्रों, दीपावली के शुभ अवसर पर घर की साफ सफाई करनी है। जिमिदार का बेटा हूँ, तो घर पर खेती का बहुत सामान है। अतः सफाई में समय बहुत लगता है। अगले भाग में आप सब को शिवखोड़ी गुफा के दर्शन करवाएं जाएंगे। तब तक के लिये मुझे जाने की आज्ञा दें ।


आप सब को आज धनतेरस, नरकचतुर्दशी, महापर्व दीपावली, गोवर्धन पूजा और भैयादूज की कोटि कोटि शुभकामनाएं देता हुआ मैं विदा लेता हूँ। जल्द ही मुलाकात होगी।

तब तक के लिये जय हिंद।

Tuesday, 10 October 2017

जनवरी में वैष्णो देवी यात्रा..... भाग-3

सभी मित्रों को नमस्कार।

 अपनी वैष्णो देवी यात्रा का तीसरा भाग लेकर मैं आपके सामने हाजिर हूं। पिछले भाग में मैंने आपको बताया था कि हमने बाणगंगा के ठंडे पानी में स्नान किया, ओर चित्र आदि खींचे।

अब उससे आगे.....


               स्नान आदि करने के बाद हम यात्रा पूरी करने के लिए निकल पड़े। हम मुश्किल से 50 मीटर भी नहीं गए होंगे कि कुछ दुकानदार आवाज़ लगाकर हमे रोकने लगे...अरे भैया रुको!! अरे भैया रुको!! हमने बोला भाई! हमे कुछ नहीं लेना, लेकिन हमारे पीछे एक बंदा भागा भागा आ रहा था ओर हमे रुकने के लिए आवाज़ लगा रहा था। वह व्यक्ति केवल मात्र गमछे में था जो उसने लुंगी की तरह लपेट रखा था। वह आकर हमसे बोला कि भाई जी आप अपना बैग चेक करवाओ।  मैं बोला भाई पहले सांस ले ले और ये बता कि ऐसा क्या हो गया जो आप हमारे पीछे आरे हो भागते हुए??  तो उसने कहा कि जहां आपने अपना बैग रखा था, उसके पास मेरे कपड़े भी रखे थे और जब मैं नहाकर फारिग हुआ तो देखा कि मेरा मोबाइल मेरी जेब में नहीं है। मैने एक क्षण की देरी न करते हुए तुरन्त अपना बैग उसके हाथों में थमा दिया और कहा कि भाई जी जल्दी चेक करलो। उसने मेरे कपड़े इधर-उधर करके अच्छी तरह से बैग को चेक किया। बैग में उसका मोबाइल होता तो ही मिलता ना, जब था ही नहीं तो मिलेगा कहां से। खैर, जो हमारा फर्ज बनता था हमण्ड तो पूरा किया। उसकी चेकिंग करने के उपरांत मैंने उसे बोला कि भाई बैग में तो नहीं है, आप एक काम करो कि आप हमारी जेब भी चेक कर लो। उसने बोला कि नहीं नहीं भाई, नही नही भाई , आपने नही उठाया होगा। आप उठाते तो खुद चेक करने के लिए क्यों बोलते?? उसकी न के बावज़ूद भी हमने खुद ही उसे अपनी जेब चेक करवाई। मोबाइल उसमें भी नहीं था। तब वह व्यक्ति क्षमा मांग कर चला गया।  हम भी इस बात को भूल कर आगे को चल दिए।


              रास्ते में सब भक्त माता के जयकारे लगाते हुए आ-जा रहे थे। हम भी उनके जयकारों का जवाब जयकारों से देते हुए चले जा रहे थे। वैष्णो देवी के यात्रा मार्ग में खाने पीने की कोई भी समस्या नहीं है। पर यहां मुफ्त में भंडारे की व्यवस्था बिल्कुल भी नहीं है परंतु रास्ते में पैसे देकर आप कुछ भी, कभी भी, कहीं भी खा सकते हैं। अब चूंकि वैष्णो देवी जम्मू कश्मीर राज्य में है, तो जाहिर सी बात है कि आपको यहां हिमाचल व उत्तराखंड के मुकाबले महंगी चीज मिलेगी। मैने स्वयं अनुभव किया कि मैग्गी की प्लेट उत्तराखंड ओर  हिमाचल में आपको 30 रुपए में आसानी से उपलब्ध हो जाती है , परंतु जम्मू कश्मीर में वही प्लेट आपको 40 रुपयेी की देते हैं। कारण पूछो तो फिर वही घिसा-पिटा बहाना.... के भाई जी। पहाड़ी एरिया है, transport के खर्चे ज्यादा हो जाते हैं। आप तुलना करेंगे तो पाएंगे कि हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के कई सुदूरवर्ती इलाकों में अगर आपको मैग्गी मिल भी जायगी तो उसका रेट वहाँ 40 रुपये होगा, जो उस हिसाब से बिल्कुल जायज़ है। पर जम्मू कश्मीर में तो यातायात के साधन भी बहुत अच्छे हैं, ओर इतना दुर्गम इलाका भी नही है, फिर भी राम भरोसे सब कुछ चल ही रहा है।
रास्ते में जलपान।


खैर, हम तो अपनी यात्रा को जारी रखते हैं। बाण गंगा घाट पर स्नान के बाद हम चलते रहे। खाना पीना तो कुछ था ही नहीं, तो सिर्फ अपने सांस को सामान्य करने के लिए हम रुकते थे।  बीच में कहीं 2 मिनट बैठ गए,  नहीं तो चलते ही रहे। उसके बाद जहां हमने सबसे अधिक विश्राम किया ओर चाय पी,  वह स्थान था अर्धकुंवारी। मुझे बहुत अच्छी तरह याद है, उस समय मैं कोई 5 साल से भी कम उम्र का होऊँगा, जब मैं परिवार सहित माता वैष्णो देवी के दर्शन के लिए आया था। उस समय मैंने अर्धकुंवारी गुफा के दर्शन किए थे, जिसकी स्मृति आज भी मेरे मानस पटल पर जीवित है। उसके बाद से वैष्णो देवी की यह मेरी चौथी यात्रा थी, पर बीच की तीन यात्राओं में कभी भी अर्धकुंवारी के दर्शन नहीं हुए। इस यात्रा में भी नहीं होते, पर उस समय यहां एक रोमांचक घटना घटी।
अर्धकुंवारी में कैंटीन के पास।

             अर्धकुंवारी दर्शन के लिए जो पर्ची उपलब्ध रहती है, हमने वो पर्ची काउंटर पर जाकर कटवाई। पर अगर आप आज पर्ची कटवाते हो तो आपको कल दर्शन होंगे। यदि आप कल कटवाते हो तो आपको अगले दिन दर्शन होंगे। कहने का तात्पर्य है कि अर्धकुंवारी पर इतनी अधिक भीड़ रहती है कि आपका उसी दिन नंबर पड़ना  बहुत मुश्किल है। हम अपनी पर्ची कटवाकर नीचे आए। हम सोच रहे थे कि 1 कप चाय और पी ली जाए कि तभी एक व्यक्ति हमारे पास आया। वह पूछने लगा कि क्या हमने उसके साथियों को देखा है?? हमने कह दिया कि भाई नहीं, हमने तो नहीं देखा। तब अचानक से उसे उसके साथी मिल गए। उनके पास अर्धकुंवारी की जो पर्ची थी, वो उसी तारीख की ही थी, लेकिन उनकी ट्रेन उस दिन शाम की थी,तो उनका विचार गुफा के दर्शन नही करने का था। बातों बातों में मैंने भी जिक्र चलाया कि भाई, यहां तो इतनी भीड़ है कि माता के दर्शन के लिए नंबर भी नहीं लगता तो उसने कहा कि भाई! हम तो दर्शन नहीं कर पाएंगे, आप ऐसा करो मेरी पर्ची ले लो और आप लोग दर्शन कर लो। उसके पास 7 व्यक्तियों की पर्ची थी पर पर्ची 7 जनों की और हम 2 । हमने पर्ची लेकर उस व्यक्ति का बहुत-बहुत धन्यवाद किया और उसके उपरांत वह चला गया।

                तभी वहाँ हमें मुरादाबाद( U.P.) का रहने वाला एक ग्रुप मिला, जो पास में खड़ा हमारी बातें सुन रहा था। उस ग्रुप में 8 जने थे तो उनमे से एक आकर हमसे बोला कि भाई जी, हमारा भी कोई जुगाड़ हो सकता है क्या??  मैं बोला कि भाई क्यों नहीं हमारे पास 7 आदमियों की दर्शन पर्ची हैं और हम 2 हैं। आप लोग अगर चाहें, तो आ सकते हैं। उनमें से 5 लोग हमारे साथ वाली पर्ची में हमारे साथ जाने को तैयार हो गए। मैंने और दिवांशु ने अपना सामान लॉकर में जमा करवाया और दर्शन के लिए लाइन में लग गए। लगभग ढाई घंटे के बाद हम अर्धकुंवारी गुफा के मुहाने पर थे ओर मैं मन ही मन माँ का धन्यवाद कर रहा था मुझे दर्शन देने के लिए।


     अर्धकुमारी गुफा एक बहुत संकरी गुफा है, जिसमें से दर्शन करने वाले को रेंग-रेंग कर निकलना पड़ता है। यह गुफा कोई बहुत ज्यादा बड़ी तो नहीं है, लेकिन तंग बहुत है। मान्यता है कि जब श्रीधर के भंडारे से कन्या रूप धारी माँ दुर्गा अंतर्ध्यान हुई थी तो भैरव से बचने के लिए इसी गुफा में माता ने 9 महीने निवास किया था। गुफा के द्वार पर माँ ने लँगूर को प्रहरी बना कर खड़ा किया था। जब लँगूर को हरा कर भैरव गुफा में प्रवेश करने लगा, तो देवी दुर्गा ने अपने त्रिशूल के प्रहार से गुफा के पीछे के भाग को तोड़ा ओर वहां से निकल गईं।


हृदय की बीमारी वाले लोगों को इस गुफा में जाने से बचना चाहिए, क्योंकि बीच में एक जगह ऐसी आती हैं जहां गुफा बहुत सँकरी तो है ही, साथ मे थोड़ा ऊपर भी चढ़ना पड़ता है। गुफा के अंतिम भाग ( जहाँ माता ने त्रिशूल प्रहार किया था) वह बहुत तंग है, ऐसे में हृदय रोग वाले मरीजों को दिक्कत आ सकती है। खैर, हमने सही सलामत गुफा में दर्शन किए और अर्धकुमारी मंदिर से बाहर आ गए। दर्शन उपरांत हमने फटाफट locker से सामान निकाला क्योंकि हल्की हल्की बारिश पड़ने लगी थी। इस बारिश का मतलब था कि अगर हम भीग गए तो समझो बीमार हुए।
जय माँ वैष्णो। जय हिमालय।

            अब हमने भवन तक जाने के लिए हाथीमत्था वाला परम्परागत रास्ता छोड़ कर एक अलग रास्ता पकड़ा। उस रास्ते पर केवल पैदल श्रद्धालु ही जा सकते हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि यह रास्ता अर्धकुंवारी के पास से बाएं हाथ की तरफ निकलता है और वहां इसकी सूचना देने के लिए बाकायदा बोर्ड भी लगा हुआ है। उस रास्ते पर चलते- चलते हमें कोई ज्यादा दिक्कत नहीं हुई क्योंकि उस रास्ते पर खच्चर और पालकियां नहीं थी। लगभग 2 घंटे के बाद हम सांझीछत पहुंच गए। यहां पर एक बार फिर सामान की चेकिंग हुई और कुछ दूर चलने के बाद वह स्थान भी आ गया, जहां से भवन के लिए प्रवेश होता है। वहां पहुंचने के बाद हमने अपना सामान, बेल्ट, पर्स व जूते आदि लॉकर में जमा किए और हाथ-मुंह धो कर दर्शन के लिए चल पड़े।

           जनवरी के महीने में भवन पर मेरी अपेक्षा से ज्यादा भीड़ थी। उस भीड़ का कारण जनवरी महीने में होने वाली 10 शीतकालीन छुट्टियां थी। लगभग 2 घंटे लाइन में लगने के बाद हमें माता के पिंडी स्वरुप के दर्शन हुए। दर्शन आदि करके हम माता के भवन से बाहर आ गए। उस समय थोड़ा-थोड़ा अंधेरा होने लगा था क्योंकि सर्दियों में सूर्य देव जल्दी ही अपने बिस्तर में दुबक जाते हैं। हमें भी बहुत भूख लगने लगी थी, ओर दर्शन भी हो गए थे। तब हमने श्राइन बोर्ड वाली कैंटीन में खाना ऑर्डर कर दिया और एक-एक गर्मागर्म डोसा और राजमा चावल का लुत्फ उठाया।

               खाना आदि खत्म करके हम भैरो बाबा की चढ़ाई के लिए चल दिए। हम बहुत थक चुके थे इसलिए भैरो बाबा की उस 3 किलोमीटर की चढ़ाई ने में हमें 1 घण्टे से भी अधिक का समय लग गया। ऊपर पहुंचकर हमने प्रसाद लिया और भैरो बाबा के दर्शन किए। और उसी समय नीचे के लिए उतरना शुरू कर दिया। उतरते समय हम बहुत ही कम जगहों पर रुके और बिल्कुल स्पीड में तेज चाल चलते हुए उतरते गए। मुझे अच्छी तरह तो याद नहीं कि मुझे कितना समय उतरने में लगा, लेकिन मैं यह कह सकता हूं कि मैं बहुत जल्दी उतर आया। नीचे कटरा पहुंचने के बाद हम ""वीर भवन"" में जो हमारा कमरा था, वहां गए और रजाई में दुबक कर लेट गए। उस समय तक मेरी सलाह थी कि हम कल सुबह की बस से शिवखोड़ी जाएंगे, लेकिन मेरा मित्र दिवांशु बार बार ना कर रहा था क्योंकि हम बहुत थक गए थे और शिवखोड़ी जाने के लिए हमें सुबह 7:00 बजे उठना था। मैं तो यात्राओं पर जल्दी उठ जाता हूं पर वह ऐसा नहीं है। इसी कारण उसके साथ मैं दुबारा किसी यात्रा पर नही गया। खैर, कुछ देर बहस के बाद यह फैसला हुआ कि कल को जो होगा, उसे कल देखेंगे। अभी तो फिलहाल सोने में भलाई है और हम रजाई के अंदर मुंह ढक कर सो गए।
चढ़ने की मुद्रा में एक चित्र। चित्र को ज़ूम करके देखिए। कुछ अलग दिखे, तो comment करके जरूर बताना जी।

एक चित्र ओर।

कौन ज्यादा सुंदर?? मैं या पीछे दिखता कटरा।

देवांशु ओर मेरा एक संयुक्त चित्र।

hahahah.... जरा साइड वाले अंकल को तो देखो।

ये था वो भाई, जिसने हमे अर्धकुंवारी के लिये दर्शन पर्ची दी थी।

यह है उस रास्ते का प्रवेश द्वार, जहां से आप खच्चरों से छुटकारा पा सकते हैं।

मेरे पीछे दिखता जगत माता का निवास।

एक फोटू अंधेरे में भी। तापमान 10 डिग्री के आसपास का तो जरूर होगा।

उतरने के समय अंधेरे में खींचा गया कटरा के सुंदर नजारे का एक चित्र।


क्रमशः

Tuesday, 3 October 2017

जनवरी में वैष्णो देवी यात्रा...... भाग-2

नमो देव्यै महादेव्यै शिवाय सततं नमः।

 नमः प्रकृतयै भद्रायै  नियतः पर्णतः स्म ताम।।


गुफा में पिंडी रूप में विराजमान माँ दुर्गा।



नमस्कार मित्रों आशा है, आप सब ठीक ठाक होंगे। अपनी यात्रा का दूसरा भाग लेकर आप सबके समक्ष में उपस्थित हूं।पिछले भाग में मैंने बताया था कि किस प्रकार हम दोनों वैष्णो देवी यात्रा करने के लिए ट्रेन से कटरा पहुंचे और वीर भवन में कमरा लेकर थोड़ी देर विश्राम किया।

अब उसके आगे.....



वैष्णो देवी यात्रा की शुरुआत की जाए, उसके पहले मैं आपको इस स्थान के बारे में कुछ जानकारी दे देता हूं। वैष्णो देवी जम्मू कश्मीर में कटरा से 14 किलोमीटर की चढ़ाई करके ""त्रिकुटा पर्वत"" पर स्थित हिंदुओं का एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थान है। यहां जाने के लिए  लगभग भारत के  हर शहर से  सुविधा है। आप बस, खुद की कार, ट्रेन व हवाई यातायात द्वारा यहां पहुंच सकते हैं।

 सबसे करीबी बस स्टैंड :- कटरा 

सबसे करीबी रेलवे स्टेशन :- कटरा

 सबसे करीबी हवाई अड्डा :- जम्मू

 सबसे करीबी हेलीपैड :- सांझी छत ( मां के भवन से 2 किमी पहले)

             यहां माता महालक्षमी, महासरस्वती और महाकाली के रूप में मां दुर्गा तीन पिंडियों के रूप में अवस्थित है। यह पिंडियाँ एक गुफा में है, जहां जाकर उन के दर्शन होते हैं। यूं तो समस्त भारत से ही हिंदू श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए वैष्णो देवी आते हैं पर उत्तर भारत के लोगों की मां वैष्णो के दरबार में गहरी आस्था है। या यूं कह लीजिए कि उनके लिए वैष्णो देवी एक सुगम तीर्थ स्थान है, जहां तक वह जल्दी और कम खर्चे में पहुंच सकते हैं। खैर, अब मैं आपको अपनी यात्रा पर लेकर चलता हूं.....


थोड़ी देर विश्राम करने के पश्चात हम उठे और चलने की तैयारी की। मैं अपने साथ यात्रा में एक छोटा बैग रखता हूं। मैंने एक गर्म स्वेटर टाइप का कपड़ा उसमें रखा और अपना नित्य क्रिया का सामान भी रखा, क्योंकि तब तक मैं दैनिक क्रियाओं से निवृत्त नहीं हुआ था। मैंने बाण गंगा में स्नान करने की सोची ओर नहाने का सारा सामान उस बैग में रख कर हम दोनों प्रस्थान कर गए। बाकी का सामान हमने वीर भवन में रहने वाले संचालक जी को पकड़ा दिया, जिन्होंने बाकायदा हमें उस सामान की पर्ची काट कर लोकर में रखवा दिया। हम यात्रा के लिए निकल पड़े। वैष्णो देवी यात्रा समस्त भारत में प्रसिद्ध बहुत है तो जाहिर सी बात है कि यहां भीड़ भी उतनी ही ज्यादा होती है। हर उम्र के श्रद्धालु माता के दर्शन की इच्छा लेकर आते हैं। लेकिन इस यात्रा पर सबसे दुखदाई चीज (जो मुझे लगती है), वह है खच्चर और घोड़े।  जब आप कटरा से यात्रा शुरू करते हैं तो यह खच्चर आपके साथ साथ ही चलते हैं और इनकी लीद बहुत बदबूदार होती है। ऐसे ही रास्ते पर पड़ी रहती है हालांकि सफाई कर्मी समय-समय पर इसकी सफाई करते रहते हैं लेकिन यहां खच्चरों की संख्या बहुत ज्यादा है तो सफाई पूर्ण रुप से नहीं हो पाती है। अपनी यात्रा शुरू करने करने के बाद हम सबसे पहले पड़ाव पर पहुंचे, वो था बाण गंगा चौंकी। यहां पर मां वैष्णो देवी की यात्रा करने वाले यात्रियों की यात्रा पर्ची बनती है और समान व व्यक्ति की चेकिंग भी होती है।  वैसे श्राइन बोर्ड द्वारा रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और कटरा में बहुत सी जगहों पर यात्रा पर्ची काउंटर की व्यवस्था है ताकि किसी एक जगह पर भीड़ इकट्ठा ना हो। हमने तो अपनी यात्रा पर्ची रेलवे स्टेशन पर ही बनवा ली थी तो हमे बाणगंगा चौकी पर सिर्फ प्रतीक्षा करनी पड़ी। लेकिन बाणगंगा चौकी पर बहुत लंबी लाइन थी क्योंकि यह यात्रा का पहला पड़ाव है जहां पर्चियां चेक होती हैं। लाइन में लगकर और पर्ची चेक करवा कर हम आगे के लिए चल पड़े।


थोड़ा आगे जाने पर T-series के मालिक गुलशन कुमार जी की याद में टी सीरीज कंपनी की तरफ से एक भंडारा लगाया जाता है जिसमें तीनों समय का खाना एक निश्चित समय तक उपलब्ध रहता है। जब हम वहां पहुंचे तो सुबह के 9:00 बजे के आसपास का समय था। उस समय वहां चाय और मट्ठी के प्रसाद वितरण हो रहा था। मैंने चाय और मट्ठी ली, लेकिन मेरे मित्र देवांशु ने कहा कि मैं तो सिर्फ चाय पीऊंगा। मैंने बोला के चल तेरी इच्छा नहीं है तो तू आगे जाकर कुछ खा लियो।

वह बोला कि मैं तो खाऊंगा ही नहीं...🙄🤔😯😯
...अरे भाई फिर कब खाएगा तू???

 मैं तो दर्शन करके ही खाऊंगा।

 ओ भाई मेरे ... 12 किलोमीटर की चढ़ाई है, रास्ते में नहाना भी है , कुछ मंदिर हैं वो भी देखने है, तो कम से कम 7 या 8 घंटे लग जायँगे।
....चाहे कुछ भी हो जाए मैं तो नहीं खाऊंगा। तूने खाना है तो खा.....

पता नहीं दोस्तों, मेरे मन में क्या आई कि मैंने वह मट्ठी  भंडारे वालों को दोबारा दे दी और आकर दिवांशु को बोला कि चल तू नही खायेगा तो मैं भी नहीं खाऊंगा। फिर हम चाय का 1 गिलास पीकर आगे के लिए चल पड़े। यहां से कुछ आधा किलो मीटर से भी कम दूरी पर बाण गंगा घाट है, जहां श्रद्धालु स्नान कर सकते हैं। हम नहाए नहीं थे तो हमने बाण गंगा घाट पर जाकर स्नान करने की सोची। कपड़े निकाल कर जैसे ही पानी में हाथ लगाया तो शरीर में झुरझुरी आन पड़ी। एक तो जनवरी का महीना और ऊपर से पहाड़ों का ठंडा पानी। बाणगंगा का जल तो जून के महीने में भी शरीर में एक बार कंपकपी उठा देता है और हम तो जनवरी में वहां थे। उस समय वहां गिने चुने सात आठ लोग होंगे जो स्नान कर रहे थे, बाकी सब पंच-स्नान की रस्म निभा रहे थे। लेकिन हमने तो स्नान करना ही था। माता का नाम लेकर जो पानी में घुसे तो बस फिर तो आधे घंटे से भी अधिक समय तक पानी मे पड़े रहे। स्नान क्रिया से निवृत होकर कपड़े आदि डालें और कुछ फोटो खींचकर फिर आगे के लिए प्रस्थान कर दिया।

मित्रों यह था मेरी वैष्णो देवी यात्रा का दूसरा भाग। आगे की यात्रा लेकर जल्दी आपके सामने हाजिर होऊंगा तब तक के लिए
 वंदे मातरम
जय श्री राम
बाण-गंगा चौंकी पर पर्ची कटवाने के लिये लाइन में लगा हुआ मैं। चित्र पर मत जाओ, ये लाइनें घूम घूम कर लगी हुईं हैं।

यात्रा की शुरूआत।

बाणगंगा में स्नान से पहले।

स्नानादि के बाद खींचा गया एक चित्र।

रास्ते मे cold-drink पान। खाना तो कुछ वैसे भी नही था।

सिर्फ फ़ोटो खीचने के लिए हंस रहा हूँ। मन ही मन तो लम्बी लाइन होने का गुस्सा है।
ओर हाँ मित्रों, अब से मैं अपनी प्रत्येक यात्रा का प्रत्येक भाग हर सप्ताह में मंगलवार को प्रेषित किया करूँगा। अगर आप सब इस छोटे से घुमक्कड़ की यात्राओं को थोड़ा बहुत भी पसन्द करते हैं, तो अवश्य पढ़ें, शेयर करें और अपना आशीर्वाद दें।

Thursday, 21 September 2017

जनवरी में वैष्णो देवी यात्रा..... भाग-1

सभी को नमस्कार।
आप सभी ने मेरी रचनाओ को जो मान-सम्मान प्रदान किया है, उसके लिये मैं आपका बहुत बहुत आभारी हूँ। जैसा कि मैने आपको पहले भी कहा था कि वर्ष 2017 ने मेरे पैरों में घुमक्कड़ी के पहिये लगा दिए। यह वर्ष मेरे जीवन मे यात्राओं का वर्ष सिद्ध हुआ। 2017 में अब तक मैं जितनी यात्राएँ कर चुका हूँ, उतनी तो शायद अपने जीवन मे भी कभी नही की। उम्मीद है आगे भी यात्राएँ चली ही रहेंगी।

चलिये अब आप सब को अवगत करवा देता हूँ, 2017 की मेरी पहली यात्रा से जो हुई माँ वैष्णो देवी के पावन दरबार दर्शन से। ये माँ का आशीर्वाद ही रहा कि उन्होंने 2017 की घुमक्कड़ी में वो रंग लगाया, वो रंग लगाया जो अब तक नही छूटा। चलिये आज पहले नवरात्रि पर बात करते हैं माँ के दरबार की यात्रा की।

हुआ यूँ कि पिछले डेढ़ साल से कभी हरियाणा के बाहर नही गया था। जितनी भी यात्राएं हुई, वह सब हरियाणा में ही हुई । उस समय दिसंबर में मैं बैंक के पेपरों की तैयारी कर रहा था, तो मैंने अपने मन में ही अर्जी लगाई कि हे मां! मेरा पेपर अच्छा हो तो मैं तेरे दरबार में आऊं (हालांकि मैं मन्नत मांगता नहीं हूं, पर घर वालो को बहकाने के लिये यह जरूरी था)।1 जनवरी को मेरा पेपर था और 5 जनवरी को मैं जाने की सोच रहा था। मेरे साथ मेरा पड़ोसी, मेरा भाई और मेरा दोस्त (वैसे तीनों एक ही हैं), उसका भी कार्यक्रम बना। मेरा पेपर अंबाला में था और आपको पता ही है कि अंबाला के पास लालड़ू में मेरे चाचा जी भी रहते हैं, तो 1 तारीख से 5 तक मैं उनके पास ही रहा।

5 तारीख को हेमकुंट एक्सप्रेस नाम की एक ट्रेन जो 9:30 बजे अंबाला स्टेशन पर जम्मू जाने के लिए मिलती है, उसकी टिकट की तैयारी में मैं लग गया। अब क्योंकि देवांशु का यह पहला कार्यक्रम था तो सारी जिम्मेदारी मेरे ही ऊपर थी, पर हमें स्लीपर श्रेणी का कन्फर्म टिकट नहीं मिला जिस कारण मैंने स्लीपर क्लास के टिकट बुक नहीं किए। अंत में फैसला हुआ कि जनरल श्रेणी में ही जाया जाएगा। नियत तिथि पर तय समय पर देवांशु अंबाला स्टेशन पहुंच गया और मैं भी। उस समय रात के 8:00 बजे थे और जल्दी- जल्दी में हम में से कोई भी रात का खाना ना तो खाकर आया था और ना ही लेकर। जाहिर है कि पूरी रात के सफर में भूख तो लगनी ही है तो हम स्टेशन के बाहर गए और 40 रुपए प्लेट के हिसाब से रात का भोजन किया। उसके पश्चात ट्रेन की प्रतीक्षा में हम टिकट लेकर बैठ गए।


 तय समय से 10 मिनट बाद हेमकुंड एक्सप्रेस छुक-छुक करती हुई आई। सामान्य श्रेणी के डिब्बों की क्या हालत होती है, यह सब मुझसे बेहतर आप जानते हैं तो धक्का-मुक्की करके हम चढ़ ही गए। मुझे सबसे गंदी बात लगती है कि तीन लोग नीचे खड़े रहेंगे पर जो लोग ऊपर की बर्थ पर अपना डेरा जमाए लेटे रहते हैं वह उन्हें बैठने की जगह देने में भी ऐसा मुंह बनाते हैं मानो अंग्रेजो ने उन्हें रायबहादुर की उपाधि दी रखी हो और हमने वह मांग ली। खैर किसी तरह लड़-झगड़ कर मैं तो ऊपर की बर्थ पर बैठ गया पर देवांशु को सीट नहीं मिली। लुधियाना जाकर नीचे की बर्थ की 3 सीट खाली हुई, तब जाकर वह बैठ पाया।

 रेल में रात का सफर कोई बहुत अच्छा नहीं रहता और साधारण श्रेणी के डिब्बे में हो तो बिल्कुल भी नहीं। अंधेरी रात हो, ट्रेन का सफर और उस पर भी खिड़की वाली सीट हो। खिड़की की दरार से ठंडी ठंडी बयारों के झोंके लगते हो। ये सब बाकी समय मे तो बहुत अच्छा लग सकता है, पर शायद जनवरी की भयंकर ठंडी रातो में ऐसा सफर किसी को नही भाता होगा।उस रात को मुझे राही मासूम रज़ा साहब का एक शेर याद आ गया-


इस सफर में नींद ऐसी खो गयी
हम तो न सोये, रात थक कर सो गयी।


खैर, मर खप कर हम किसी तरह (कभी सोए कभी जागे)  पर 6:00 बजे के आसपास कटरा पहुंच गए। सर्दियों में तो सुबह के 6 बजे भी ऐसा लगता है मानो रात के 2 बजे हों। कटरा स्टेशन पर (जो अभी नया बना है) ), मैं तो वहां जा चुका था पर दिवांशु कभी वहां नहीं गया था तो वो रात के अंधेरे में जगमगाते कटरा स्टेशन पड़ अपने फोटो लेने लगा। वहां उसके चित्र लेने का फायदा यह हुआ कि कुछ चित्र मैंने अपने भी खिंचवाए।  फिर रेलवे स्टेशन से फोटो आदि लेकर हमने एक ऑटो किया और कटरा के मुख्य बाजार में पहुंच गए। वहां से मां वैष्णो देवी के दरबार का बहुत ही सुंदर दृश्य दिखाई दे रहा था।

 क्योंकि मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक हूं और कटरा में संघ के एक अनुशासित संगठन द्वारा एक धर्मशाला टाइप का एक सस्ता सा होटल चलाया जा रहा है। मुझे किसी ने बताया था तो मैं सीधा ""वीर भवन"" में ही पहुंचा। वीर भवन जाकर ₹200 के हिसाब से एक कमरा लिया और अपना सामान पटक कर बेड पर छलाँग मार दी। रात को अच्छी नींद नहीं आई थी और आज भी पूरी यात्रा करनी थी तो थोड़ी देर कमर सीधी करने की सोची और लेट गए।
     
          मित्रों आपकी वही जानी पहचानी शिकायत कि मैं प्राकृतिक दृश्यों के फोटो नहीं डालता, इस भाग में भी रहने वाली है। परंतु केवल इस यात्रा के लिये मैं माफी चाहता हूं। वैष्णो देवी यात्रा के बाद की जितनी भी यात्राएं मैं लिखूंगा उनमें आपकी यह शिकायत नहीं रहेगी।

 पर आप  हर बार की तरह इस बार भी मुझे माफ करेंगे। इसी आशा के साथ अगली कड़ी लेकर जल्द हाजिर होऊंगा। तब तक के लिए

 जय माता की
वंदे मातरम

कभी कोई सो गया , कभी जा गया।

इस तरह से वो रात काटी थी।
I


कटरा रेलवे स्टेशन के बाहर का चित्र। पीछे सफ़ेद रंग की जो लाइन सी दिख रही है, वो माता के भवन तक जाने वाला मार्ग ही है मित्रों।

Wednesday, 6 September 2017

हरियाणा का हिमालय आदिबद्री

सभी को नमस्कार,

वंदे मातरम

  मेरा एक पोस्ट लिखने का बहुत दिल कर रहा था पर पड़ोस में कुछ बच्चों ने गणेश उत्सव के लिए पंडाल सजा रखा है जिसमें हर रोज गणेश जी की महिमा का गान होता है। थोड़ा बहुत तो सुरताल हम भी मिला लेते हैं तो हर रोज वहां 8:00 से 10:00 भजन संध्या के आयोजन में शामिल होना पड़ता था। कल ही गणपति विसर्जन हुआ है तो आज आपके लिए एक नई जगह की नई पोस्ट लेकर हाजिर हूँ।
           पिछली पोस्ट में आप से वादा किया था किया था कि हाजिर होऊंगा तो 2017 के जनवरी माह की यात्रा के साथ पर 2012 से 17 के बीच में बहुत सी यात्राएं की गई थी। उनमें से कुछ यात्राओं के चित्र मेरे पास उपलब्ध नहीं है और कुछ 1 दिन की यात्राएं भी हैं। पर खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि मुझे उस वादे का तोड़ना पड़ेगा और आपको इस नई जगह के बारे में बताना पड़ेगा।

आपमें से बहुत से मित्र तो लेख के शीर्षक को देख कर भी चकित हो गए होंगे कि हरियाणा में हिमालय कहां से आ गया।पर्वतराज तो हिमाचल, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर आदि क्षेत्रों में मिलते हैं। तो मित्रों वास्तविकता भी यही है की हरियाणा में हिमालय नहीं अपितु शिवालिक और अरावली की छोटी पहाड़ियां है और उन्हीं शिवालिक की पहाड़ियों की गोद में स्थित है आदिबद्री।  हरियाणा का एक बहुत ही घुमा जाने वाला toursit destination. यह यात्रा मैंने पिछले वर्ष 2016 में की थी। आज आपको इस जगह की सैर मैं अपने साथ करवाता हूं।


यह फोटो मेरे द्वारा खींची गई नही है। इंटरनेट से आप लोगों को गर्भगृह दिखाने के लिए डाउनलोड की है।




हरियाणा का एक जिला है- यमुनानगर। उत्तर प्रदेश की सीमा से सटे जिले में शिवालिक की पहाड़ियों की भरमार है।हरियाणा का सबसे अधिक घूमा जाने वाला मोरनी हिल्स नाम का हिल स्टेशन भी यमुनानगर के पास में ही है, पर है पंचकूला जिले में। चलिए मैं अपनी बात पर आता हूं। यमुनानगर के सडोरा नामक शहर में मेरे चाचा जी रहते हैं। वहां अध्यापक हैं, तो एक बार उनके साथ मैं वहां गया। उस दिन मंगलवार था। दिन मुझे अच्छी तरह याद नहीं तो हमारा कार्यक्रम बना जगाधरी के प्रसिद्ध श्री पंचमुखी हनुमान मंदिर में जाने का, लेकिन इस पर्वत प्रेमी को यह मैदानी इलाके कहां पसंद आते हैं। उस दिन हल्की हल्की बारिश भी हो रही थी तो मैंने चाचा जी से कहा कि आदिबद्री चलते हैं। मैं वहां पहले भी हो चुका था लेकिन वहां जाए हुए बहुत समय हो गया था। चार पांच बार कहने पर चाचा जी मान गए और सब परिवार हम आदिबद्री के लिए प्रस्थान कर गए। मुझे गाड़ी अच्छी तरह से चलानी नहीं आती पर ड्राइवर के साथ वाली सीट पर बैठना मुझे बहुत पसंद है। इससे आप प्राकृतिक दृश्यों का भरपूर आनंद उठा सकते हैं। तो मैं अपनी पसंदीदा सीट पर पसर गया। बारिश बीच में हल्की हल्की हो रही थी और साथ में किशोर कुमार के गाने भी गाड़ी के स्टीरियो में बज रहे थे। सडोरा से आदिबद्री कोई 30-35 किलोमीटर के आसपास है। बीच में हमने गाड़ी रोकी और कुछ फोटो वगैरा लिए और उसके बाद आगे के लिए प्रस्थान किया।
यहाँ मैं आपको एक बात बता दूं, जो भी मित्र आदिबद्री जाना चाहते हैं। तो उसके 2 रास्ते हैं, एक जो सडोरा से होकर जाता है। दूसरा रास्ता से जाने के लिये आपको यमुनानगर के एक कस्बे बिलासपुर तक पहुंचना पड़ेगा व फिर आगे के लिये प्रस्थान करना होगा।
रास्ते के हरे भरे खेत
परिवार के साथ एक संयुक्त चित्र




आप सबने सरस्वती नदी के बारे में तो सुन ही रखा होगा कि सरस्वती नदी धरती में अलोप हो गई और आज भी सरस्वती धरती के नीचे बहती है। राजस्थान, गुजरात आदि राज्यों के कुछ जिलों में राडार परीक्षण के माध्यम से यह साबित भी हो चुका है। सरस्वती नदी के उद्गम स्थल के बारे में बहुत सी धारणाएं हैं ।वास्तव में सरस्वती नदी का उद्गम स्थल आदिबद्री है। वहां आज भी पहाड़ों से रिस रिस कर पानी आता है और एक छोटी सी नदी का रूप ग्रहण कर लेता है। आदिबद्री पहुंचने पर सबसे पहले सरस्वती उद्गम स्थल के दर्शन किए गए। पवित्र नदी के जल का आचमन किया और फिर भगवान बद्रीनाथ के दर्शन करने के लिए हम चले गए। गाड़ी को पार्किंग में लगा कर मैं परिवार सहित मंदिर में दर्शन के लिए चला। मंदिर तक पहुंचने के लिए 100 के करीब सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। उन सीढ़ियों पर चढ़ने के बाद आपको मंदिर के दर्शन होंगे।

यह श्री आदि बद्री नारायण का प्रवेश द्वार

इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि भगवान विष्णु ने जब बद्रीनाथ में तप किया तो उससे पहले वह यहां कुछ देर ध्यान में लीन रहे, इसीलिए इस जगह का नाम आदिबद्री यानी आरंभ का बद्री पड़ा। मंदिर के अंदर जाने पर भगवान विष्णु की उसी प्रकार की मुद्रा में मूर्ति दिखाई पड़ती है जैसी उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम में है। क्योंकि मंदिर के गर्भ ग्रह में फोटो लेना वर्जित था तो मैं उसका चित्र नहीं खींच पाया। मंदिर छोटा है परंतु आकर्षक है। दोपहर का समय था और मंदिर में भंडारे का भी आयोजन था। कढ़ी चावल बने हुए थे और हम खाने बैठे तो मेरी चाची जी ने अपना पर्स अपने पास रख लिया था। यहां एक बहुत ही कमाल की घटना घटी। एक बंदर आया और उस पर पर्स को उठा कर पेड़ पर चढ़ गया । इसमें चाची जी का मोबाइल और कुछ पैसे भी थे तो शोर मचाना तो लाजमी था। पर अगर शोर मचाने से ही बंदर उठाया हुआ सामान दे दे, तो उसे उत्पाती कौन बोले?  खैर तब वहां मंदिर के पुजारी जी आए और 10-15 लोग जो वहां उपस्थित थे, उन्होंने डरा-धमकाकर किसी तरह बंदर से वह पर्स नीचे गिरवाया और तब हमने वह उठाया। जिस जगह पर आदि बद्री नारायण का मंदिर है, उससे कुछ दूर जाकर आदि केदार नाम से भी मंदिर है, जहां भगवान शंकर का शिवलिंग है।फिर हम परिवार सहित उस मंदिर में गए और भगवान भोलेनाथ के दर्शन किए। कमाल है हमें देख कर पुजारी स्वयम अपने कमरे से निकल कर आये और हमसे भगवान आशुतोष का जलाभिषेक करवाया। बदले में उन्होंने हमसे 1 रुपए की भी मांग नही की। खैर भगवान से उनका वरद-हस्त यूँ ही सिर पर बनाये रखने की कामना की और नीचे सरस्वती नदी की तरफ आ गए। सरस्वती में थोड़ा उछल-कूद मचाने के बाद हमारी मंत्रणा देवी नाम की एक पहाड़ी पर चढ़ने की योजना थी।  परन्तु यहां  एक गड़बड़झाला हो गया।


      हुआ ये कि मेरी छोटी बहन बोली कि  नदी के उस पार जा कर दिखा तो तुझे Dhartiputra मानूँ । बस फिर क्या था, मैंने बेवकूफी की ओर चल दिया उस पार। नदी में सिर्फ टखनों तक पानी था , लेकिन पता नहीं कहां से बीच में गढ्ढा आ गया और मैं धड़ाम से उसमें गिर पड़ा। यह तो ईश्वर की कृपा रही की मात्र 2  सेकेंड के समय से पहले मैं उस पानी के गड्ढे से निकल गया,  वरना वहां कोई बचाने वाला भी नहीं था। इस 2 सेकंड में ही मैं पूरा गीला हो गया और मेरे मोबाइल में पानी चला गया। अब एकदम से फोन बचाने के डर के कारण हम मंत्रणा देवी की चढ़ाई तो नहीं कर पाए। गाड़ी में आकर उसका हीटर चलाकर मैंने अपना फोन सुखाया, पर वो on नही हुआ।  तब अंबाला जाकर केयर में दिखाया और उसे ठीक करवाया।
सरस्वती नदी के अंदर खड़ा होकर खिंचवाया गया चित्र। इसके कुछ देर बाद ही मैं पानी में गिर पड़ा था



          तो मित्रों यह भी आदि बद्री की यात्रा। मुझे पता है आप सब लोग कहेंगे मैंने गलती की , नदी के पार नही जाना चाहिये था। बिल्कुल सही बात है जी मैंने वास्तव में गलती की। पर कहते हैं न कि व्यक्ति किताबों से कम अनुभव से अधिक सीखता है, ओर ये अनुभव मुझे हो चुका है।
जल्दी ही आपके समक्ष उपस्थित होऊंगा एक नई यात्रा के साथ , तब तक के लिये

वन्दे भारत मातरम
इस द्वार के अंदर है वह स्थान, जहां सरस्वती का उद्गम स्थल माना जाता है।
माफी चाहूंगा मित्रों, इस लेख में आपको प्राकृतिक नजारों के चित्र कम देखने को मिलेंगे। उस समय मैं घुमक्कड़ नही था, एक यात्री मात्र था जो केवल अपने व अपने परिवार के चित्र खीचने में रुचि रखता है। आने वाले लेखों में आपकी इस शिकायत को दूर करने का भरपूर प्रयास किया जाएगा


मेरे ठीक पीछे जो पहाड़ी दिख रही है, उसी के ऊपर है मंत्रणा देवी का मंदिर, पर फोन खराब होने की टेंशन में मैं वहां नहीं जा पाया।

इस यात्रा में मेरा सबसे पसंदीदा चित्र

Monday, 21 August 2017

पूर्णाहुति..... मेरी पहली यात्रा का अंतिम भाग

नमस्कार मित्रों

कैसे हो आप सब?? 
                  आशा करता हूँ, आप सभी कुशल होंगे। अपनी यात्रा की अंतिम कड़ी लेकर मैं आप सभी लोगों के समक्ष हाजिर हूं। वैसे तो मेरी इस यात्रा में कुछ ख़ास नहीं है, पर यहाँ इसका वर्णन करना इसलिये जरूरी है क्योंकि मेरी इसी यात्रा से मेरे अंदर घूमने का कीड़ा पनपा था, जो शायद इस जन्म में तो मुझे काटता ही रहेगा। सच बताऊं तो मैं खुद भी नही चाहता कि ये कीड़ा मेरे से पल्ला झाड़े।


पिछले भाग में मैंने आपको बताया था कि मेरी सारी खुशियों पर पानी फिर गया। आज मैं आपको उसका कारण बताता हूं। जब मैं ताज महल से बाहर निकला तो जहां जूते निकाले थे वहां जब जूते वापस लेने के लिए गया तो क्या देखता हूँ कि वहां मेरे जूते नहीं थे। यह मेरे लिए एक बड़ा झटका था, क्योंकि वह जूते मैंने मात्र डेढ़ या दो महीने पहले लिए थे। उस समय वहां धूप भी इतनी थी कि उस फर्श पर पैर रखना मानो अंगारों पर चलना और इस भयंकर गर्मी में अपने कमरे तक नंगे पांव जाने की मैं सोच भी नहीं सकता था। अब मेरे सामने केवल मात्र दो ही विकल्प था कि किसी और के जूते उठाउँ और चल दूँ, या फिर अपने जूतों का इंतज़ार करूँ( कोई गलती से डालकर भी जा सकता है)। मैंने दूसरा विकल्प चुना ओर वहां बैठ कर इंतजार किया कि शायद कोई मेरे जूते वापस दे जाए पर  उस प्रतीक्षा का कोई परिणाम नहीं निकला। तब मैंने वहां रखे हुए एक जोड़ी जूते पहने और ताजमहल से बाहर निकल लिया।


               पर हमारे लिए शायद आज का दिन ही खराब था। जब हमने ताजमहल के लिए प्रस्थान किया था तो जो गर्मी के कारण कपड़ो में बदबू हो गई थी, उससे बचने के लिए हमने कपड़े धोकर सूखने के लिए डाल दिए थे। हम वापस आए तो हमारा दिमाग ही सटक गया। एक कहावत है न 
"" कंगाली में आटा गीला""  
लगता था किसी ने हमारे भविष्य का अनुमान लगाकर ही उस कहावत को घड़ा था। इस होटल की छत पर बंदरों के आतंक के साक्ष्य साफ दिख रहे थे और इस आतंकवादी हमले में हमारी 3 जोड़ी जुराब, एक कैपरी और दो टीशर्ट शहीद हो गई। खैर, हम कर भी क्या सकते थे। भारी मन से उन्हें फेंका और खाने के लिए बाहर चले गए। खाना खाकर वापस आए और सो गए।

      लेकिन इस यात्रा का अंत यही पर नहीं होता। अगले दिन हम फतेहपुर सीकरी गए। वहां का बुलंद दरवाजा, जिसका निर्माण अकबर ने करवाया था, उसे देखा। अंदर मुस्लिम संत सलीम चिश्ती की दरगाह थी, उसे भी देखा और 10 रूपय में एक गाइड किया था, उसके झांसे में आकर 501 रुपए की कोई चद्दर पीर पर चढ़ाई। उस समय बालमन था, पहली यात्रा थी, कोई अनुभव नहीं था तो यह सब हो गया, लेकिन आज सोचता हूं कि काश उस समय थोड़ा दिमाग लगा लेता तो मेरे 500रु बच जाते।  खैर इन्हीं खट्टे-मीठे अनुभवों से ही यात्राएं याद रहती हैं।
बुलन्द दरवाज़े के सामने हम दोनों का संयुक्त चित्र।


                फतेहपुर सीकरी से आकर हम मथुरा के लिए प्रस्थान कर गए। सबसे पहले वहां जाकर भगवान श्रीकृष्ण जन्म स्थान को देखा बहुत ही भव्य और आलीशान मंदिर वहां बना हुआ है। सुरक्षा की दृष्टि से हमारे मोबाइल और बेल्ट वगैरह सब बाहर रखवा दिए गए। हम अंदर गए, दर्शन किए और मथुरा के अन्य मंदिरों को देखने के लिए चल दिए। रंगनाथ स्वामी का मंदिर मुझे बहुत प्रिय लगा। फिर रात को कमरा लिया, खाना खाया और सुबह 5:00 बजे का अलार्म लगा कर सो गए। 

                   अगले दिन जब सुबह उठे तो वृंदावन जाने की इच्छा हुई। वहां जाकर सबसे पहले बांके बिहारी जी के दर्शन किए और मित्रों आपको बता देता हूं कि जब 2012 में हमने वृंदावन भ्रमण किया था तो उस समय प्रेम मंदिर (जिसे आज वृंदावन का सबसे आलीशान मंदिर माना जाता है), वह उस समय बनकर तैयार ही हुआ था। उस समय जब हमने प्रेम मंदिर में प्रवेश किया तो मुश्किल से वहां 20 लोग भी नहीं होंगे। आज प्रेम मंदिर की भीड़ से आप सभी परिचित होंगे पर उस समय हमारा सौभाग्य था कि हमने प्रेम मंदिर के हर एक उस कोने को देखा, जहां इस भीड़ में देखना असंभव है। वैसे तो हम गोवर्धन पर्वत दर्शन का विचार भी बना चुके थे, पर मेरे मित्र मोहित जैन के घर से एक जरूरी फोन आ गया और हमें वापसी करनी पड़ी।
यमुना तट पर एक चित्र मेरा भी।


             तो दोस्तों यह थी हमारी पहली यात्रा जिसका लक्ष्य तो कुरुक्षेत्र था पर हम लक्ष्य से भटके और आगरा पहुंच गए इस यात्रा का मेरे जीवन पर यह असर पड़ा कि इससे घुमक्कड़ी का जो बीज मेरे मन मे पनपा आज वो पौधा बन चुका है। और मैं इस पौधे को बड़ा करने के लिये निरन्तर यात्रा रूपी पानी से इसे सींच रहा हूँ।

वैसे तो मैं इस कड़ी को ओर भी लम्बे कर सकता था, पर आप सभी को आगरा आदि स्थानों के बारे में मुझसे भी ज्यादा जानकारी है तो आपका समय मैं खराब नही करूँगा। 2012 की इस यात्रा और 2017 के बीच मे ओर भी कई जगह घूमना हुआ, पर उनके चित्र मेरे पास उपकध नही है अतः उनका वर्णन यहां पर करना बेमानी होगी। 

जल्द ही 2017 में कई गयी यात्राओं के साथ हाजिर होऊंगा, तब तक के लिये आप सब को वन्देमातरम।

 ।।।हर हर महादेव।।।